सुख कहिलै नपाए पछी


पुरुषोत्तम सुवेदी

मलाई शुख चाहियको छैन- थर नै कंगाल भय पछी ।
मलाई सिकारको के खांचो- पेसै चन्डाल् भय पछी ।।

मलाई बस्त्रको के खांचो-शरिरभरी घावै घाऊ भै दिय पछी ।
मलाई के थाह हांसोको -गह भरी आसु भै दिय पछी ।।

मलाई घर महलको के महत्व-कही कतै डेरा नपाय पछी ।
मलाई न्यानोको के आभास- माया कतै नभय पछी ।।

मलाई अन्यायको के खांचो - मुलुकमै न्याय नभय पछी ।
मलाई दु:ख संग के पिडा -सुख कहिलै नपाय पछी ।।

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